मां के हाथ का खाना

मां के हाथ का खाना,मां जब खाना बनाती है, तो उसे पता रहता है किस बच्चे को कौन-सी सब्जी अच्छी नहीं लगती। वह उसके लिए भी कोई न कोई विकल्प सोचकर रखती है। वह जानती है कि किसे मिर्च कम और किसे ज्यादा चाहिए। कौन बाजरे की रोटी पसंद करता है और किसी मिस्सी की रोटी पसंद है। मां को पता है कि किस बच्चे को दाल से गैस होती है और किसे लहसुन का छोंक अच्छा लगता है। मां के हाथ के खाने से बच्चों में मोटापा नहीं बढ़ता। रसोई में उठती खाने की गंध और उसमें मिला मां का प्यार बच्चे के तन-मन को कैसे प्रभावित करता है, मां भगवती का वह स्वरूप जिससे संसार को भरण पोषण और अन्न वस्त्र मिल रहा है वे अन्नपूर्णा स्वरूप हैं.मां अन्नपूर्णा की उपासना से समृद्धि, सम्पन्नता और संतोष की प्राप्ति होती है. इसके साथ ही साथ व्यक्ति को भक्ति और वैराग्य का आशीर्वाद भी मिलता है.

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे।
ज्ञान वैराग्य सिद्धयर्थ भिखां देहि च पार्वति।।

माना जाता है कि मां अन्नपूर्णा की भक्ति के शुभ प्रभाव से घर में अन्न का भण्डार भरा रहता है।यह भोजन मंत्र असल में माता पार्वती के अन्नपूर्णा स्वरूप का ही ध्यान है। साथ ही शांति, स्वास्थ्य, धन और समृद्धि घर-आंगन में बनी रहती है।

पूरन पूरी हो या दाल बाटी, तंदूरी रोटी हो या शाही पुलाव ,खिचड़ी, अचार, छाछ ,मीठे, नमकीन भोजन की अपनी एक विशिष्टता है ।स्वादिष्ट खाना बनाना एक कला है, इसी कारणवश संस्कृति में इसे पाक कला कहा गया है। आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि करी का इतिहास 5000 वर्ष पुराना है।

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